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Reviewed in India on 30 August 2019
यह कहानी शुरू होती है विदर्भ नामक जगह पर आक्रमण से जहां के राजा विक्रमाजीत हैं और जिन्हें हरा पाना नामुमकिन है। बलिष्ठगढ़ के राजा भार्गव विदर्भ पर आक्रमण करने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। वह राजा विक्रमाजीत उनके भाई एवं पुत्रों को छल कपट का इस्तेमाल करके राजमहल से कहीं दूर भेज देते हैं। ऐसा वह राजा विक्रमाजीत के महल से दिव्य मणि चुराने के लिए करते हैं। और वह उसे चुराने में सफल हो ही जाते हैं कि राजा विक्रमाजीत वहां पहुंचकर अपनी जीत सुनिश्चित कर लेते हैं। इन सबके बीच सबसे अचंभित करने वाली घटना तेजस्वी का उस भव्य मणि को उठाना होता है। विक्रमाजीत और उनके वंशजों को यह वरदान है कि केवल वह ही इस मणि को उठा सकते हैं परन्तु तेजस्वी कैसे फिर उस मणि को उठा पाता है ? और किस कारण से वह मणि को चुराने के लिए इतना प्रयत्न कर रहें हैं? जब राजा विक्रमाजीत को उनके उदेश्य के बारे मैं पता चलेगा तो क्या वह मणि तेजस्वी को सौप देंगे?
तेजस्वी का जन्म ही रक्षराज मार्केश का अंत करने के लिए हुआ है। परन्तु उसका वध करने के लिए जिस विजय धनुष की आवश्यकता है वह केवल पाताल लोक से लाया जा सकता है। क्या तेजस्वी, अखण्ड, सुर्यम और यूगँधर पाताल लोक से विजय धनुष ला पाने में सफल होंगे? इन सबके बीच में होने वाले रोमांचक युध्द ने इस कहानी को बेहद ही उत्तम मोड़ दिया है।

⚔ कहानी आपको अंत तक अपने साथ जोड़े रखती है।
⚔ किरदारों का वर्णनन काफी बेहद सही प्रकार से किया गया है जो कि सराहनीय योग्य हैं।
⚔ जिस प्रकार से लेखक ने अध्यायों को एक दूसरे से जोड़ा है उससे कहानी को समझने में आसानी होती है।
⚔ कहानी में काफी किरदारों के नाम है जो शुरुआत में थोड़ा उलझाता है परन्तु जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है रोमांच के साथ किरदारों की कड़ी जुड़ती चली जाती है।
⚔ इसमें हुए युध्द का वर्णनन बेहद उम्दा किया गया है जिसे पढ़कर लगता है मानो युध्द अपके समक्ष ही हो रहा है।
⚔ लेखक ने अत्यधिक प्रभावशाली ढंग से हिन्दी भाषा की यह किताब लिखी है जो मुझे बहुत पसंद आया।
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4.2 out of 5 stars
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